Goat Farming: जमनापारी बकरी के लिए मिला नेशनल अवॉर्ड, क्यों खास है बकरी की ये ब्रीड, कितने लीटर दूध देती है

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  Jamunapari Goat: इन दिनों जमनापारी बकरी काफी चर्चा में है. CIRG, मथुरा में इस नस्ल के संरक्षण-संवर्धन का काम चल रहा है. यहां जमनापारी बकरी...

 

Jamunapari Goat: इन दिनों जमनापारी बकरी काफी चर्चा में है. CIRG, मथुरा में इस नस्ल के संरक्षण-संवर्धन का काम चल रहा है. यहां जमनापारी बकरी ने कृत्रिम गर्भाधान के बाद स्वस्थ मेमने को जन्म दिया है.



Jamunapari Goat Farming: गांव से लेकर शहरों तक अब पशुपालन का चलन और भी बढ़ गया है. दूध उत्पादन के लिए अब किसान गाय-भैंस पालकर अच्छा पैसा कमा रहे हैं. कुछ किसान गाय-भैंस का खर्चा नहीं उठा पाते, इसलिए वो बकरी पाल लेते हैं. छोटे किसानों की आय को बढ़ाने में बकरियों का अहम रोल है. ये छोटे पशु की श्रेणी में आती है, जिसके रख-रखाव में ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता. सरकार भी अब बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय पशुधन मिशन स्कीम के जरिए अनुदान दे रही है. इस एक फायदेमंद बिजनेस हो सकता है.


सरकारी स्कीम का लाभ लेकर 2 से 4 बकरियां खरीदें और इनका संरक्षण-संवर्धन करके बकरियों की संख्या को बढ़ाएं. इस तरह धीरे-धीरे मुनाफा भी बढ़ता जाएगा. वैसे तो देश में बकरी की दर्जनों प्रजातियां है, लेकिन देसी नस्लों की बात करें तो इन दिनों जमनापारी बकरी का नाम खूब चर्चाओं में है



जमनापारी बकरी के लिए नेशनल अवॉर्ड

देश में बकरियों के संरक्षण और संवर्धन का काम के लिए केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (CIRG), मथुरा का नाम टॉप पर आता है. ये संस्था पिछले 43 साल से बकरियों की देसी नस्लों के संरक्षण और सुधार काम कर रही है.


इस संस्था ने पहली बार लैप्रोस्कोपिक तकनीक का इस्तेमाल कर बकरी में आर्टिफिशल इंसेमीनेशन यानी कृत्रिम गर्भाधान करवाया और 5 महीनों के बाद बकरी ने एक स्वस्थ मेमने को जन्म दिया. अभी ये मेमना करीब 25 से 30 दिन का हो गया.


केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के इन्हीं सफल प्रयासों के लिए नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक्स रीसोर्सेज की ओर से नेशनल अवॉर्ड दिया गया है. फिलहाल संस्थान का मेन फोकस है कम सीमेन में ही ज्यादा से ज्याद जमनापारी बकरियों का कृत्रिम गर्भाधान हो, जिससे इस नस्ल को विलुप्त होने से बचाया जा सके.


क्यों खास है जमनापारी बकरी

जैसा कि नाम से ही साफ है जमनापारी बकरी का मूल स्थान यमुना नदी के आस-पास के इलाके हैं. इन इलाकों में बकरी की इस नस्ल को दूध और मांस के लिए पाला जाता है. उत्तर प्रदेश के इटावा, गंगा, यमुना और चंबल नदियों से सटे इलाकों में जमनापारी बकरी पालने का खूब चलन है.


बकरी की इस नस्ल पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता. ये बकरियां जंगली पत्तियां और चारा खाकर भी काम चला लेती है और कम दाना-पानी लेकर ही 2 साल में तंदुरुस्त हो जाती है. बाकी नस्लों की तुलना में जमनापारी बकरी की ब्रीडिंग भी अच्छी है.


एक ही जमनापारी बकरी अपने जीवनकाल में 13 से 15 बच्चों को जन्म देती है. इस नस्ल के बकरे 70 से 90 किलोग्राम, जबकि बकरियां 50 से 60 किलोग्राम वजनदार होती है. जमनापारी बकरी के दूध में मिनरल और सॉल्ट की मात्रा अधिक होती है. यह रोजाना 2 से 3 लीटर दूध देती है, जिसमें कई औषधीय गुण होते हैं.


किसानों को होगा फायदा

जमनापारी बकरी को लेकर किसान तक की रिपोर्ट में सीआईआरजी के डायरेक्टर डॉ. मनीष कुमार बताते हैं कि हम सीधा किसानों के संपर्क करते हैं और कृत्रिम गर्भाधान के जरिए बकरियों की संख्या बढ़ाने में मदद करते हैं. हर एक बकरा 20 से 22 हजार रुपये का आता है, लेकिन आर्टिफिशियल इंसेमीनेशन के जरिए किसानों को ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता.


एक्सपर्ट ने बताया कि हम पिछले 4 से 5 साल में 4,000 से ज्यादा जमनापारी बकरे-बकरियां किसानों को दे चुके हैं. अब जमनापारी बकरी के लिए नेशनल अवॉर्ड भी मिल गया है तो इसके बारे में जागरूकता के साथ-साथ इसकी डिमांड भी बढ़ेगी.


इन राज्यों में जमनापारी बकरियों का जलवा

अब लोग डेयरी फार्मिंग के लिए गाय-भैंस जैसे बडे़ पशुओं को रखना ज्यादा पसंद करते हैं, जिसके चलते बकरी जैसे छोटे पशुओं पर ज्यादा फोकस नहीं रहता. यही वजह है कि बकरी की कई नस्लें अब कम होती जा रही हैं.


इन्हीं में शामिल है जमनापारी बकरी, जिसके संरक्षण और संवर्धन के लिए कई सरकारी और निजी संस्थाएं काम कर रही हैं. केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय की रिपोर्ट से पता चला है कि जमनापारी बकरी पालन में उत्तर प्रदेश नंबर-1 पर है, यहां 7.54 लाख जमनापारी नस्ल के बकरे-बकरियां है. मध्य प्रदेश में 5.66 लाख, बिहार में 3.21 लाख, राजस्थान में 3.09 लाख और पश्चिम बंगाल में भी 1.25 लाख से अधिक जमनापारी बकरियां पाली जा रही है.

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